बीस साल के फ़िल्मांकन, बार‑बार के दौरों और सहेजे गए रिश्तों के दम पर बनी यह छह भागों की डॉक्यूमेंट्री सीरीज़ ग्रामीण महाराष्ट्र से लेकरसमकालीन भारत में जाति, विस्थापन, विकास और प्रतिरोध का जायज़ा लेती है 

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छह फिल्में बन रही हैं

इस श्रृंखला का मुख्य विषय महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र है। गोसीखुर्द बांध के कारण कई परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़े और उन्हें नई बस्तियों में पुनर्वासित किया गया। वहाँ ये परिवार फिर से अपने घर बसा रहे हैं, आजीविका के साधन तलाश रहे हैं और एक नई शुरुआत कर रहे हैं। हालाँकि, यह श्रृंखला यह भी उजागर करती है कि इन नई बस्तियों में भी जातिगत भेदभाव और असमानता वैसी ही बनी हुई है।

Map a
  • जात

    CASTE
    #1
  • विस्थापन

    Displacement
    #2
    Film 2
  • आंदोलन

    Movement
    #3
    Film 3 2026 10 07 191024 rtro

इसके बाद, यह श्रृंखला ताडोबा और उमरेड‑करहांडला के जंगलों का रुख करती है। यहाँ यह दिखाया गया है कि वन्यजीव संरक्षण, वन प्रबंधन और वन विभाग की गतिविधियों के कारण स्थानीय लोगों के जीवन में किस तरह के बदलाव आ रहे हैं। तत्पश्चात, इस श्रृंखला की यात्रा उत्तर की ओर बढ़ते हुए हिमालय की तलहटी तक पहुँचती है।

Map b
  • बांध

    Dam
    #4
    Film 4
  • शेतकरी कष्टकरी

    Farmer–Labourer
    #5
    Film 5
  • जंगलात

    The forest frontier
    #6
    Film 6

२० साल का फुटेज

India Bhimraya के निर्माण के दौरान बीस वर्षों में जुटाए गए फुटेज, साक्षात्कारों, गीतों और अभिलेखीय सामग्री की एक झलक।

पहली फिल्म बन रही है

श्रृंखला एक जीवित संरचना के रूप में जाति से शुरू होती है: नामों, स्कूलों, मंदिरों, जल स्रोतों, अपमान, गीतों और यादों में।

जात

CASTE
#1

हम डॉ. अम्बेडकर को सुनते हैं

विधिवेत्ता, राजनीतिक चिंतक और दलित मुक्ति आंदोलन के प्रमुख नेता डॉ. आंबेडकर ने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति की अध्यक्षता थे । 1956 में उनका बौद्ध धर्म स्वीकार करना जाति-व्यवस्था से एक ऐतिहासिक विच्छेद था। बीबीसी के आर्काइव्हल में संरक्षित उनकी आवाज़ से इस श्रृंखला की शुरुआत होती है।

हम उत्तम कांबळे से मिलते हैं

दलित लेखक और चिंतक—जो इस श्रृंखला के कथा-सूत्र का मुख्य आधार हैं। उनका गहरा सामाजिक विश्लेषण, सहज हास्यबोध और बेबाक अंदाज व्यक्तिगत जीवनकथाओं को व्यापक इतिहास के साथ खूबसूरती से जोड़ते हैं।

अपमान का सामना 

जाति शरीर और रोज़मर्रा की चीज़ों के ज़रिए जी जाती है—रीति-रिवाज़ों, पानी, भोजन, स्कूल, नामों और दहलीज़ों में। अपमान कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का ही एक हिस्सा है।

India Bhimraya, क्यों ?

अगस्त २०२६ में, दोस्त और परिवार दिल्ली में एकत्र हुए। इंडिया गेट के सामने उत्तम कांबळे ने India Bhimraya के अर्थ पर बात की: आंबेडकर को केवल किसी अल्पसंख्यक समुदाय की स्मृति नहीं, बल्कि भारत की साझा राजनीतिक भाषा का हिस्सा मानना — वही विचार जिसे इस श्रृंखला में बार‑बार सुनाई देने वाले भीम गीत लंबे समय से आगे बढ़ाते आए हैं।

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सैकड़ों घंटों की रिकॉर्डिंग, साक्षात्कार, गीत और आर्काइवल सामग्रियाँ पहले ही जुटाई जा चुकी हैं। अब चुनौती इस परियोजना को शुरू करने की नहीं, बल्कि इस असाधारण संग्रह को छह पूर्ण फिल्मों का रूप देने की है

प्रोजेक्ट के बारे में

फिल्म निर्माता

जोएल कबालियों टूर विश्वविद्यालय  में समाजशास्त्री हैं और ​‘India Bhimraya’ के निर्देशक हैं। उनका यह कार्य महाराष्ट्र के विदर्भ में दो दशकों  से भी अधिक समय तक किए गए गहन फील्डवर्क  पर आधारित है। वे 2009 से 2013 और पुनः 2022 से 2026 तक नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर ह्यूमन साइंसेज़ (CSH) से संबद्ध रहे हैं।

संगठन

India Bhimraya फ्रांस के टूर्स शहर में पंजीकृत संस्था L’Atelier Bhimraya द्वारा संचालित एक परियोजना है।